Turning the wheel…

…..when the blue water plays with the shore to tell something…..

Archive for the ‘Own Hindi Poems’ Category

रेवा की धारा…!

Posted by Rewa Smriti on April 22, 2017

I am so lucky and thankful for my best friend Ruchi, who reminded me of writing a poem. I actually forgot that “main likhti bhi hun!?” 😉 She is not only a friend but I am fortunate enough to have her as family. Ruchi, I can’t express how much it means to me to have you in my life.

I haven’t written for a long time so it’s difficult for me to recall my own poem. I am truly blessed with the friends I have in my life. You are an invisible force in my poems.  I wrote this poetry to bring me back to my own tune. 🙂

कुछ को,
किसीके होने का भय
कुछ को,
किसीके ना होने की चाह
इस होने, ना होने के दरमियाँ
बांधों के बंधन को तोड़
अखंड प्रवहिनी,
आती-जाती तूफानों में
लहर की झड़ियाँ लहराती
एकांत में,
कल – कल, छल – छल
अविचल बहती
चल पड़ी वो अपनी राह
सच की बुनियाद गढ़ने!
किंतु अपरिचित इससे
लोभ के थोक व्यापारी
रोक ना पाए रेवा की धारा!

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written on: 20.04.2017

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Feeling of…

Posted by Rewa Smriti on March 29, 2014

तस्वीर तेरे दिल की कुछ बोलती नही किसीसे!
फिर किसी की नज़र क्यूँ टिकी पड़ी है तुझपे!!

वो गिर गये हैं अपनी नज़र से, तुझे गिराने में!
झुक गयी है नज़र उनकी, तेरी ज़िंदगी आज़माने में!! 🙂

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परिंदों का गुज़रना!

Posted by Rewa Smriti on November 23, 2013

खामोश लफ़्ज़ों से अभी – अभी किसी ने यूँ इशारा किया !
इस शहर से परिंदों का गुज़रना भी अब उसे गंवारा लगता!!

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सभ्य कौन !?

Posted by Rewa Smriti on April 20, 2012

पुरुष, तेरा पुरुषत्व कहाँ?

पुष्पहार, दिव्य गंध,
श्रेष्ठ आभूषण से लदे
अग्नि परीक्षा लेने वाला
मर्यादा पुरुषोत्तम,
है वो तेरा राम कहाँ?

अस्तित्व को खोता हुआ
तुम्हें खोजती,
धरा गयी है खीज
बोली विवश वह आज
सुन, खड़ा सभ्य अहंकारी
छलका सभ्यता का अहंकार
अगर कह सको?
कहो, तेरा पुरुषत्व कहाँ?

शब्द का श्रृंगार करता
पत्थरों के बीच
उलझा अतित
द्विधाग्रस्त, अचल, मौन
पत्थरों पर अंकित
पुरुषार्थ की कलरव गाने वाला
शंसय के सारे बाँध खोल!

सभ्य कौन यहाँ, पापी कौन?
बोल, धरा का इतिहास!
सम्मुख रक्खे किसका चरित्र?

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कैसे भूल पड़ी तू अपना परिचय!

Posted by Rewa Smriti on April 27, 2011

जड़ चेतन की सिसकियों से
मूक वंघिमा लिए आँसू
अवाक होकर बह निकली
व्यथित मन, क्षुब्ध नयन
स्मृति-पथ में
चले विवश धीरे-धीरे!
 
धूमगंध में खोई कहीं
धून्ध से भी धुँधली
धुएँ के संग उड़ चली
सिसकियों की गूँज में
अपरिचित धुन्ध बनकर!

विराट वृक्ष की कोलाहल
सहानुभूति की शुष्क डालियां
सिसकियों  के बीच
स्मृति-पथ में लाती, कहती-
पगली हाँ सम्हाल ले,
कैसे भूल पड़ी तू अपना परिचय?

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निकल पड़ी हूँ नीर बनकर!

Posted by Rewa Smriti on July 30, 2010

ठहरी-सी शहर में,
हाथ फैलाए ज़िंदगी,
खामोशी के पहलू में,
थके पाँव अपनी,
धूमिल निशा ढूँढती!

मन ने चाहा,
क़रीब से गुजरती,
क्षितिज को छूती,
मद्धिम हवाओं को,
क्षण भर के लिए,
मुट्ठी में क़ैद करना !

और, वह रेत-सी,
हाथों से फिसलकर,
सरसराती निकल पड़ती !

वक्त अपने कन्धों पर,
फलसफों का बोझ ढोता,
थकता नहीं,
किन्तु मैं! थककर भी,
अपने अस्तित्व से जुड़ी,
निकल पड़ी हूँ नीर बनकर!

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काफिलों का शोर!

Posted by Rewa Smriti on December 17, 2009

दिल भी बेकाबू होकर बहता है, कभी बहकता है
नदी की तरह ये बेवक़्त प्यार के हिलोरे लिया करता है!

बर्फ की चादर पर चलते कदम जाने कब ठिठक जाएं
कैसे कहें हम, ये दिल अक्सर हदे पार किया करता है!

अंधेरों की आड में, क़ाफिलों के चलने के शोर से
भागते हुए लम्हों को देख दिल अक्सर रो लिया करता है!

क्या कहूँ, कई बार उदास दिल लफ्ज खोकर भी
कुछ सोच रोते रोते दो पल को मुस्कुरा लिया करता है!

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Note: The poem’s title is suggested by Ruchi. Thanks Ruchi!

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चुपके से चली आऊँगी!

Posted by Rewa Smriti on June 3, 2009

चेहरे पर शिकन तक ना देख पाओगे,
हल्की फुहारों में जब भींगती चली आऊंगी!

तेरे बज़्म में है ज़न्नत, तुम ये समझ पाओगे,
सबसे नज़र बचाके जब भागती चली आऊंगी!

सुलझे रिश्तों के धागे को, यूँ ना उलझा पाओगे,
असलियत बयाँ करने जब हर बार चली आऊँगी!

बहते आँसू में दबी दर्द को, तुम ना पहचान पाओगे,
पिघलती बर्फ की चादर जब ओढ़ती चली आऊँगी!

चाँद की चाँदनी में बैठ, मुझे ना आज़मा पाओगे,
गुमसुम बैठा चाँद के साथ जब चुपके से चली आऊँगी!

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बेनाम रिश्ते!

Posted by Rewa Smriti on April 8, 2009

कभी – कभी उठ जाते हैं कदम वज़ूद को दफ़नाने में,
बेवक़्त जब खुद ही किस्मत का नक़ाब उतार जाती हूँ!

आज कैसे? क्या कहूँ? वक़्त भी पूछ उठा,
ऐसे लम्हों से गुजर, अक्सर मैं क्यूँ बहक जाती हूँ!

बदनाम करते हैं लोग, बेनाम को नाम देते हुए,
सरेआम महफ़िल में जाने कब मज़ाक बन जाती हूँ!
 
हर शख़्स यहाँ वफ़ा के साथ तर्क़-ए-वफ़ा  करता है,
राह चलते इन वफा परस्तों को अब आगाह कर जाती हूँ!

रिश्तों की पहचान हो जाती है नाज़ुक दिल को,
बेनाम रिश्तों में जब कभी अपना नाम ढूँढने जाती हूँ!

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रो पड़ी अखंड प्रवाहिनी!

Posted by Rewa Smriti on March 17, 2009

वक़्त का एक टुकड़ा
जाने कब गिरा
तलहटी के सन्नाटे में
और, तुम्हारे शब्द
हवा में बिखर
इधर – उधर
मुझे पुकारते रहें!
अचंभित दिशायें,
तुम्हारे शब्दों में उलझ
तुम्हें तलाशती रहीं!

ज़िंदगी की गुत्थी
सुलझाने की
गहन कोशिश में
ना जाने कब, कैसे?
हालातों के इस राह में
खुद ही फ़स गयी!

और, अब वक़्त के
आपा धापी में
मुट्ठी भर रेत लिए
भटक रही हूँ
इस गली से उस गली,
कभी इस शहर से
उस शहर तक,
कभी पागल
पूरवइया के साथ
पगडंडियों पर!

उसी चौराहे पर
पहुँचकर अब
थका उदास मन
एक बार फिर से
बेचैन हो उठा
और, रो पड़ी
अखंड प्रवाहिनी…!

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