Turning the wheel…

…..when the blue water plays with the shore to tell something…..

कैसे भूल पड़ी तू अपना परिचय!

Posted by Rewa Smriti on April 27, 2011

जड़ चेतन की सिसकियों से
मूक वंघिमा लिए आँसू
अवाक होकर बह निकली
व्यथित मन, क्षुब्ध नयन
स्मृति-पथ में
चले विवश धीरे-धीरे!
 
धूमगंध में खोई कहीं
धून्ध से भी धुँधली
धुएँ के संग उड़ चली
सिसकियों की गूँज में
अपरिचित धुन्ध बनकर!

विराट वृक्ष की कोलाहल
सहानुभूति की शुष्क डालियां
सिसकियों  के बीच
स्मृति-पथ में लाती, कहती-
पगली हाँ सम्हाल ले,
कैसे भूल पड़ी तू अपना परिचय?

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8 Responses to “कैसे भूल पड़ी तू अपना परिचय!”

  1. Nice lines Bhabhi 🙂

  2. Nidhi said

    विराट वृक्ष की कोलाहल
    सहानुभूति की शुष्क डालियां
    सिसकियों के बीच
    स्मृति-पथ में लाती, कहती-
    पगली हाँ सम्हाल ले,
    कैसे भूल पड़ी तू अपना परिचय?

    Zabardast,bahut bahut bahut hi achi poem hain..beautiful poem yaar….i loved it!!!
    i wil b very happy if u don’t forget ur ‘identity’.

  3. Nidhi said

    its only 4 u….

    चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
    जाग तुझको दूर जाना!

    अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले!
    या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;
    आज पी आलोक को ड़ोले तिमिर की घोर छाया
    जाग या विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले!
    पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना!
    जाग तुझको दूर जाना!

    बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?
    पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?
    विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
    क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल दे दल ओस गीले?
    तू न अपनी छाँह को अपने लिये कारा बनाना!
    जाग तुझको दूर जाना!

    its written by 1 of ur most favorite poetess ‘Mahadevi Verma’

  4. mehek said

    धूमगंध में खोई कहीं
    धून्ध से भी धुँधली
    धुएँ के संग उड़ चली
    सिसकियों की गूँज में
    अपरिचित धुन्ध बनकर
    this stanza is awesome,kuch apne hi dhundh mein khoyi si,gehra saar magar khud ki pehchan banata hua waah.

  5. Amit said

    धूमगंध में खोई कहीं
    धून्ध से भी धुँधली
    धुएँ के संग उड़ चली
    सिसकियों की गूँज में
    अपरिचित धुन्ध बनकर

    Rewa, I really appreciate your nice words. I adore the way you present your poems. So innocent and pure. Thanks for sharing a very good poem.

  6. Nitin said

    Superb poetry!!

  7. पगली हाँ सम्हाल ले,
    कैसे भूल पड़ी तू अपना परिचय?

    यह आवश्यक भी है …:-)
    शुभकामनायें !

  8. shubham said

    suuuuuuuuuuper!

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