Turning the wheel…

…..when the blue water plays with the shore to tell something…..

निकल पड़ी हूँ नीर बनकर!

Posted by Rewa Smriti on July 30, 2010

ठहरी-सी शहर में,
हाथ फैलाए ज़िंदगी,
खामोशी के पहलू में,
थके पाँव अपनी,
धूमिल निशा ढूँढती!

मन ने चाहा,
क़रीब से गुजरती,
क्षितिज को छूती,
मद्धिम हवाओं को,
क्षण भर के लिए,
मुट्ठी में क़ैद करना !

और, वह रेत-सी,
हाथों से फिसलकर,
सरसराती निकल पड़ती !

वक्त अपने कन्धों पर,
फलसफों का बोझ ढोता,
थकता नहीं,
किन्तु मैं! थककर भी,
अपने अस्तित्व से जुड़ी,
निकल पड़ी हूँ नीर बनकर!

*****************

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19 Responses to “निकल पड़ी हूँ नीर बनकर!”

  1. bahut sundar rachna ,,,,,aapki kalpanashakti ka sukhad ehsaas karati hui….!!! badhaai !!!

  2. आनन्‍द said

    शोभनम्
    उत्‍तम: लेख:

    ब्‍लाग जगत पर संस्‍कृत प्रशिक्षण की कक्ष्‍या में आपका स्‍वागत है ।

    http://sanskrit-jeevan.blogspot.com/ पर क्लिक करके कक्ष्‍या में भाग ग्रहण करें ।

  3. very nice..and i really appreciate the contents of the site..

    I have inspired to write a blog for my Navodaya http://www.jnvalumni.blogspot.com

    let me know about any suggestions and improvement….

    With Regard
    Balram Parmar
    NIT Warangal

  4. rohit said

    अपने अस्तित्व से जुड़ी,
    निकल पड़ी हूँ नीर बनकर!

    अचानक आज आपके पोस्ट पर आया। आते ही ताजा कविवा मिली। काफी अच्छी है। पर आपने अचानक कम लिखना क्यों कर दिया। उम्मीद करता हूं कि ब्लॉग पर आप की लेखनी दोबारा चल पड़ेगी सदानीरा कि तरह…

  5. rohit said

    ये आरोप गलत है कि हम आते नहीं। आपने लिखना कम कर दिया है। कई बार आपसे शिकायत की है की आप हैं कहां। आप एक बार पहले आईं थी मेरे ब्लॉग पर फिर बिना ध्यान से पढ़े या जल्दी से चली गईं थी। मैने लिखना नवंबर में ही शुरु कर दिया था। आपके ब्लॉग का मैं नियमित पाठक रहा हूं। शायद आप भूल गईं। आपने लिखना क्यूं कम किया ये आप जाने। आपकी पोस्टों से ही पता चल जाएगा की आप कितना अंतराल रखने लगी हैं अपने पोस्टों में। रीवा जी आप बहता नीर बनिए। हम किनारे बैठकर उसके साहित्य सौन्दर्य का आनंद लेते रहेगे। आपके पाठक बने हमें दो साल से ज्यादा हो गए और शायद आपको पता ही नहीं है।

  6. Nidhi said

    किन्तु मैं! थककर भी,
    अपने अस्तित्व से जुड़ी,
    निकल पड़ी हूँ नीर बनकर!

    wonderful.
    ur existence gives peple hope nd i hope u won’t stop!!
    keep flowing!!!

  7. Ranjeeta said

    Your existence is above thoughts and feelings. You are a flowing river, nothing can stop you.

  8. anupam jha said

    arrreee arree arree aaap to bass..serious hi ho jate ho:) Good Ji!how r u?Rewa Ji?

  9. santosh dwivedi said

    really di its a motivational as well as great poem.

  10. Kiran said

    मद्धिम हवाओं को,
    क्षण भर के लिए,
    मुट्ठी में क़ैद करना !

    और, वह रेत-सी,
    हाथों से फिसलकर,
    सरसराती निकल पड़ती !

    Very pretty and I enjoyed reading your poem.

  11. mehek said

    किन्तु मैं! थककर भी,
    अपने अस्तित्व से जुड़ी,
    निकल पड़ी हूँ नीर बनकर!
    behad sunder,bahav hi zindagi hai,har shabd jaise dil ke paas se gujar raha ho.bahut achha laga rews bahut dino baad sunder kavita padhke,khas kar aapki,luv u.mehek.

  12. rohit said

    लो फिर गायब हो गई ………………..आखिर कहां गोता लगा जाती हैं….या फिर किसी काम में ही बिजी हैं..हफ्ते में एक बार आना अपेक्षित है

    रोहित
    http://www.boletobindas.blogstpo.com

  13. drvishwassaxena said

    Dear Rewa
    A truely rewa smriti style of expression of poetry.Yes you are undaunted,unstopable,immaculate sway of innocent emotion and pious dreams.During your course a few blockades of this worldly challenges may hold you for a while but they won’t be able to stop you for long you will dissolve them in your might and proceed ahead to cherish the civilisation.Rave rewa to cool the parched world.Magnify your realm to so that darkness of this world is conquered by you,illuminate the earth by the light of you persona and for this ascend higher and higher.With blessings
    Dr Vishwas saxena
    [vishwas bhaiya]

  14. रेवा जी! सादर नमस्कार…
    विश्वास भैया जी की बातों से मैं सौ फीसदी सहमत हूँ| आपकी लेखनी आपके मनोवेग को उकेरती हुई सबकुछ अपने साथ बहा ले जाना चाहती है| यहाँ मैं दो शब्द कहना चाहूँगा जो आपके व्यक्तित्व की परिमाप है लघिमा ओर द्रघिमा| लघिमा का अर्थ है अपने आप को शून्य में विलीन कर देना और द्रघिमा का अर्थ है शून्य को ही अपने आप विलीन कर देना| आपकी इस रचना में परस्पर दोनों भाव एक दुसरे से आलिंगनबद्ध हैं| लेकिन आपका द्रघिमा-सा व्यक्तित्व अनायास ही मुझे गंभीरता की डोरियों में बांध विवश करता है|

  15. speechless.. so amazing ‘n pure !!

  16. एक बार बहुत पहले एक कमेन्ट दे गयीं थी मेरे ब्लॉग पर !http://satish-saxena.blogspot.com/2008/09/blog-post.html
    पता नहीं क्यों शुरुआत की ब्लागिंग के दिनों में किया गया एक कमेन्ट ६८८१ कमेंट्स में से, आज भी स्मृति में है स्मृति ! शुभकामनायें !!

  17. satyajeet said

    pata nahi, kavita achi hai shayad. Bt sau bat ki ek bat.. Tum thak kyu gai? Aur nir bankar kidhar ja rahi ho.. Aur kisi ne tumse ye pucha kyu nahi? Jaldi batao.. Mare suspese ke mera bura hal hai…

  18. Satyajeet said

    Yayavarji.. thoda sa virodh ka aabhas hai…
    Aap gambhir ho jaate hai, aur mai jab sochta hu ki kitna serious hogi ye likhte samay to meri hasi foot parti hai.. pata nahi kyu…

  19. Mayank said

    Thanks for such a wonderful post. It was a great read.

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