Turning the wheel…

…..when the blue water plays with the shore to tell something…..

बेनाम रिश्ते!

Posted by Rewa Smriti on April 8, 2009

कभी – कभी उठ जाते हैं कदम वज़ूद को दफ़नाने में,
बेवक़्त जब खुद ही किस्मत का नक़ाब उतार जाती हूँ!

आज कैसे? क्या कहूँ? वक़्त भी पूछ उठा,
ऐसे लम्हों से गुजर, अक्सर मैं क्यूँ बहक जाती हूँ!

बदनाम करते हैं लोग, बेनाम को नाम देते हुए,
सरेआम महफ़िल में जाने कब मज़ाक बन जाती हूँ!
 
हर शख़्स यहाँ वफ़ा के साथ तर्क़-ए-वफ़ा  करता है,
राह चलते इन वफा परस्तों को अब आगाह कर जाती हूँ!

रिश्तों की पहचान हो जाती है नाज़ुक दिल को,
बेनाम रिश्तों में जब कभी अपना नाम ढूँढने जाती हूँ!

********************************

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28 Responses to “बेनाम रिश्ते!”

  1. neeshoo said

    हर शख़्स यहाँ वफ़ा के साथ तर्क़-ए-वफ़ा करता है,
    राह चलते इन वफा परस्तों को अब आगाह कर जाती हूँ!

    रिश्तों की पहचान हो जाती है नाज़ुक दिल को,
    बेनाम रिश्तों में जब कभी अपना नाम ढूँढने जाती हूँ!

    बेहद सुन्दर लगी ये लाइनें ।

  2. anil kant said

    आपने बहुत खूबसूरती से बयाँ किया है ….शब्दों का जादू सा चल गया

    मेरी कलम – मेरी अभिव्यक्ति

  3. mehek said

    रिश्तों की पहचान हो जाती है नाज़ुक दिल को,
    बेनाम रिश्तों में जब कभी अपना नाम ढूँढने जाती हूँ!

    waah sunder bat kahi,bahut khub

  4. रिश्तों की पहचान हो जाती है नाज़ुक दिल को,
    बेनाम रिश्तों में जब कभी अपना नाम ढूँढने जाती हूँ!

    रेवा जी आपकी इस रचना के लिए मेरे पास शब्‍द नहीं हैं क्‍या कहूं बहुत ही सुंदर लिखा है आपने लगता है एक एक शब्‍द को तरास कर ये सुंदर रचना बनाई हे बेहतरीन

  5. Dr Anurag said

    उदास रचना .

  6. Amit said

    रिश्तों की पहचान हो जाती है नाज़ुक दिल को,
    बेनाम रिश्तों में जब कभी अपना नाम ढूँढने जाती हूँ!

    Another brilliant poem!

  7. Nidhi said

    “हर शख़्स यहाँ वफ़ा के साथ तर्क़-ए-वफ़ा करता है,
    राह चलते इन वफा परस्तों को अब आगाह कर जाती हूँ!”

    wah wah kia likha hai.
    tarif karu kia uski,jsne tumhe banaya. 🙂
    mohtarmaji kia bat hai,ajkal ghalibana shama jala rakha hai? 😉

  8. यूँ हीं पूछ लिया करता हूँ,
    कभी-कभी दिल से!
    क्यूँ दस्तूर-ए-वफ़ा निभाते हो|
    वो होतीं नहीं मयस्सर!
    तुम्हारे मौत पर भी,
    और तुम नाहक..!
    दिल में दिये जलाते हो|
    सच कहा तुमने…
    रिश्तों की पहचान है नाज़ुक दिल को!
    ये कह कर भी तुम..!
    छोड़ तनहा गुज़र जाते हो..
    जरा बेबाक हूँ मैं,
    ये फितरत नहीं थी अब से पहले|
    अब कि ये सोचता हूँ…
    मेरी उम्र दर-दर घटे|
    और तुम्हारी मियादें बढा दी जाये..!

  9. PK said

    यूँ हीं पूछ लिया करता हूँ,
    कभी-कभी दिल से!
    क्यूँ दस्तूर-ए-वफ़ा निभाते हो|
    वो होतीं नहीं मयस्सर!
    तुम्हारे मौत पर भी,
    और तुम नाहक..!
    दिल में दिये जलाते हो|

    waah waah anuraag bhai kya ghazab likha hai, zabardast wording hai.

  10. Nidhi said

    “क्यूँ दस्तूर-ए-वफ़ा निभाते हो|
    वो होतीं नहीं मयस्सर!
    तुम्हारे मौत पर भी,
    और तुम नाहक..!
    दिल में दिये जलाते हो|”

    @anurag bhai,adaab arz hai 🙂
    andaz-e-bayaan kya arz kia hai.bahot khoob.excellent….

  11. पी.के.जी और निधि जी आपलोगों की सराहना का मैं शुक्रगुजार हूँ| सच बोलूं तो ये रेवा जी की ग़ज़ल ने ही मेरे अन्दर ये ज़ज्बात पैदा किए, और बस मेरी कलम चल पड़ी…..| असल में सराहना की सच्ची हक़दार रेवा जी हीं हैं| रेवा जी! इतनी भावपूर्ण रचना के लिये आपको पुनः बधाई देता हूँ जिसके बिम्ब ने मुझे भी आपके पाठकों की सराहना का पात्र बना दिया|

  12. लाजवाब लिखा है. आपकी उर्दू शब्दों पर भी उतनी ही पकड़ है जितनी हिंदी पर.
    खासकर ये वाली लाइन छू गयी –
    रिश्तों की पहचान हो जाती है नाज़ुक दिल को,
    बेनाम रिश्तों में जब कभी अपना नाम ढूँढने जाती हूँ!

  13. एक उत्तम रचना| जिसे बार बार पढने का दिल करता है|

  14. abhay said

    रिश्तों की पहचान हो जाती है नाज़ुक दिल को,
    बेनाम रिश्तों में जब कभी अपना नाम ढूँढने जाती हूँ!

    i liked dis line very much…………

  15. vah vah…bahut khoob..bahut faltu time hai

  16. ek dost..aanjana sa..pehchana sa said
    April 10, 2009 at 12:52 pm
    vah vah…bahut khoob..bahut faltu time hai

    “एक दोस्त..अंजना सा..पहचाना सा” वाह! वाह! बहुत खूब..बहुत फालतू नाम है..! माँ-बाप ने यही नाम रखा है क्या तुम्हारा? सच बोल रहा हूँ भगवान कसम बहुत फालतू नाम है…सुधार करो इस नाम में और अपनी सोच में भी|

    क्यूँ अंजना साहब आप में तो ज़रा-सी भी तमीज़ नाम की चीज़ नहीं है? अगर होती तो यही बात अपना नाम लिख कर बताते जिसके जगह पर आपने लिखा है “एक दोस्त..अंजना सा..पहचाना सा|” आपके पास कविताओं को पढ़ने-समझने-भर का दिमाग तो है नहीं…. तो फिर क्यूँ खामखा अपने और अपने माँ-बाप की बेइजती करवाने पर तुले हो| अरे हाँ…!, मैं तो भूल ही गया तुम तो अपना असली पहचान छुपाकर ये बकवास कर रहे हो| सुनो! मेरी सलाह मानो अपना सही नाम लिखकर कोई कमेंट किया करो तब तुम्हारे साथ दो-दो हाथ करने का मज़ा आयेगा|

  17. Nidhi said

    @ek dost..aanjana sa..pehchana sa
    kamal kar dita je.tusi te bade gr8 ho,rsgule di pl8 ho,cok di cr8 ho, ande da oml8 ho.tu ki kardi aa ethey?ethey aa k apna time waste kardey aa.tusi mere veerji jao ja k chup chap apna kam kar.

  18. Nidhi said

    koun kehta hai dost tumse hamari judai hogi,
    yeh afwah kisi aur ne udayi hogi,
    shaan se rahenge aapke dil mein hum,
    itne dino mein humne kuch to jagah banayi hogi. 🙂

  19. dr vishwas saxena said

    well I know you only by your poetry and info given in your website which I feel is quite suffecient.I would like to respond/reinforce your poem entitled “benaam rishtey” by my self composed poem written in Roman script[sorry I am unable to type in hindi].The title is ‘Shayad issi liye bana hoon mein’
    Tapish say bhari dhara per,ambuj ka chalawa hi sahi,
    Per doobti aaso ka nirbal asra to hoon mein
    meri vaidna chitkar ko ger tum warid ki garjna samjh lo to kya galat hay!
    tum say adhik jalkar,tum say adhik tap ker ban dhoomra sa uttha hoon mein!
    kal mein baras kar nasht ho jaonga
    aur de jaoonga NAVPRERNA,NAVCHETNA VA NAVJEEVAN
    —shayad issi liye bana hoon mein
    Dr vishwas saxena
    09414550982

  20. rohit said

    hello rewa
    kia khub likhti ho..kitna sundar likhti ho…

    or kia kahu. bas samjha karo…

    rohit

  21. Rachana UC said

    Rewaji,

    Bahut khub: Benaam rishtome apana naam dhundhne jaati hu.” Eisa laga ki aapne is panktime mere dilki baat likha di. Kash me aapki tarah likh paati.
    Aapke liye mere do prashan hai: kya me apani kavita yaha likh shakti hu? Aur agar me hindime likhana chahu to kaise likh shakati hu?

    Rachana

  22. @रचनाजी,

    सर्वप्रथम मैं आपका इस ब्लॉग पर स्वागत करती हूँ. आपको मेरी कुछ पंक्तियाँ अच्छी लगी, उसे सराहने के लिए आपको धन्यवाद! एक अनुरोध है, प्लीज़ आप मेरे नाम के साथ ‘जी’ मत लगाइए, मुझे अच्छा नही लगता है. हां, बिल्कुल आप अपनी कविताएँ इस ब्लॉग पर लिख सकती हैं, और अगर आप खुद के लिए ब्लॉग बनाना चाहती हैं तो उसके लिए भी मैं मदद करने के लिए तैयार हूँ. अब आप डिसाइड करें कि आप क्या चाहती हैं.

    rgds.

  23. ishwar said

    jo rishte NAAM k seemao se bandh jaate hai,un rishto mai samay/paristhiti/ k saath utaar chadaaw aata rahata hai ….magar jo RISHTE BENAAM ho …wo dil k itane kareeb jude rahete hai shayad ta-umra unase yo hi jude rahate hai aur wakt k saath un rishto mai aur bhi praghadata aa jati hai…un rishto mai chah kar bhi kabhi kadawapan nahi aata …shayad isaki pavirata (BENAAM RISHTE) hi is rishte ko kaayam rakhanee ko mazboor ho jaata hai…..is rishte mai jo garamahat hai,jo meethapan hai,jo aatamiyata hai,jo samarpan k bhaw hai,jo pavitrata hai …shayad yahi is kadi ko jodane ko aur is AHASAAS k saath jude rahane ko mazaboor karata hai……is rishte mai SWARTH k liye koi jagah nahi hai …aur ye rishta sirf DENA hi jaanata hai…CHAHANA to shayad janata hi nahi…

  24. ishwar said

    maafi chaahata hu aapake dil se nikale pavirta bhaw jinhone GAZAL ka roop le liya……usako mera naman..bas yo hi aapaki kalam ka safarnama yo hi chalata rahe ….inhi shabdo k saath aapako shubh kaamana

  25. Shahrukh Khan said

    Bahut gajhab likha hai bhai !! Khush Raho !

  26. Rishibala said

    Har khomoshi mein ek baat hoti hai,
    Har dil mein ek yaad hoti hai,
    Aapko pata ho ya na ho par aapki khushi k liye roz fariyad hoti hai.

    u write very well
    kaash ye kala mujhme v hoti
    🙂

  27. Lokendra said

    बहुत खूब……….
    इक सुन्दर गजल छिपी थी….जो मुझे आज यहाँ मिल गई….

  28. ram naresh said

    आपकी कविता पढ के मेरा दिल अनायास ही उस अनजाने रिरते मेँ आपके नाम के साथ 2 अपना नाम भी खोजना चाहता है1 RAM NARESH PATEL .JNV REWA MP.(1999-2006)

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