ज़माने ने आज़मा लिया भरी महफ़िल में
एक आह तक ना निकली और तुम रो पड़े!
ज़िंदगी भी पूछ बैठी आज इस मोड़ पर
क्यूँ बीच राह में यूँ तेरे कदम लड़खड़ा पड़े!
Posted by Rewa Smriti on September 28, 2008
ज़माने ने आज़मा लिया भरी महफ़िल में
एक आह तक ना निकली और तुम रो पड़े!
ज़िंदगी भी पूछ बैठी आज इस मोड़ पर
क्यूँ बीच राह में यूँ तेरे कदम लड़खड़ा पड़े!
Posted in Own Hindi Poems, Own Sher n Ghazal | 19 Comments »
Posted by Rewa Smriti on August 26, 2008
नही जानती
तुम्हारा साथ
कब तक है…
पर, भरोसा है
ख़ुद से ज़्यादा
ज़िंदगी पर
और, पता है?
इससे भी ज़्यादा
मुझे एतबार है
तुम पर!
क्यूँकि….
साथ तुम्हारा
हर दिन
एक नयी सुबह का
आगाज़ है
और, हर शाम
एक नया एहसास है!
************
Posted in Own Hindi Poems | 19 Comments »
Posted by Rewa Smriti on August 9, 2008
हो क्षितिज कितनी ही दूर,
सूरज को भी ढलना होगा
छोड़ दूर किनारे की चिंता
साहिल तुझको चलना होगा!
लहरों की उछालों से ना पूछ
तेरा ज़हां कहाँ है ?
जिस ओर बढ़ा दे तू कदम,
तेरी ज़मीं, तेरा ज़हां वहाँ है!
अब सृजन की बेला है
बन सृजक, तू कर सृजन
थमने ना पाए तेरी क़लम
उससे पहले भले ही,
स्याही सारी हो जाए ख़त्म!
Posted in Own Hindi Poems | 22 Comments »
Posted by Rewa Smriti on August 6, 2008
सूरज की मद्धिम
लालिमा ओढ़
फिक्र सारे छोड़
पलाश, तुम खिले!
एक दिन यूँ ही,
ठंडी हवा के
हल्के झोंके से
पलक झपकते
पलकों में सपने छोड़
डाल से झड़कर
कुछ ऐसे गिरे कि
क्षण में ही
छिन्न भिन्न होकर
इधर-उधर बिखर गये…
उसी डाल की
एक अकेली पात,
टहनियों से लिपट
उसे कसकर पकड़
कई दिनो तक
खामोश रोती रही
एक डर,
और एक आस
दिल में लिए कि
वापस आओगे…
अनायास ही
एक रात अचानक
ऐसी बारिश हुई
पल भर में
नीचे गिरी, और
अलसायी घासों के
घनी झुरमुटों में
पलास, तुझे ढूँढती
नाज़ुक लम्हों से
यूँ ही ग़ुजरती,
थकी उदास साँसें
ना जाने कब
कहाँ खो गयी…
******
Posted in Own Hindi Poems | 12 Comments »
Posted by Rewa Smriti on June 20, 2008
रुला कर कहते हो
तुम रुला दोगी मुझे!
कैसी विडंबना है
सोच सहम जाती हूँ
और, कैसे ये ज़ज्बात
बिन बारिश भींग रहे
कई घरोंदे आस पास
आँसुओं में बह रहा
एक स्वप्न भरा संसार!
क्या तुम कर पाओगे,
मेरी इन बातों का एतबार?
Posted in Own Hindi Poems | 26 Comments »
Posted by Rewa Smriti on June 11, 2008
क्यूँ करते हो मुझसे प्यार
जब भी पूछती हूँ यह सवाल,
उत्तर पाती इस तरह हर बार-
रेवा, ‘हर बात पूछी नही जाती’!
कैसे समझाऊं खुद को
तुम्हारे इस खामोशी का राज़,
छुपे हें इनमें खूबसूरत एहसास
जिनकी चाहत हो उबरने को आज!
जिस दिन पा लूँगी सारे जवाब,
उस दिन समझूंगी तुम्हारा प्यार
फिर लफ़्ज़ों की ना होगी कोई शिकायत,
क्योंकि, तेरे वश में ना होगा इंतज़ार
तुम दिल से ना कर पाओगे इनकार!
अंत में, पूछ ही लेती हूँ एक सवाल,
क्या कभी खुद से जाहिर कर पाओगे
ख्वाबों में ही हुए मिलन का एहसास?
**************
Posted in Own Hindi Poems | 25 Comments »
Posted by Rewa Smriti on May 22, 2008
शोर मचाती शब्दों में इतनी पहचान कहाँ,
दिल की बातें दफ़न होती हवाओं में यहाँ!
कई मोड़ पर पूछ ही लेते हें, पूछने वाले
हक़ीक़त क्या है, यह क्या माज़रा है यहाँ?
गर होती उनमें थोड़ी भी समझदारी, तो
बेवजह ना बरसाती सवालों की भीड़ यहाँ!
क्या दोष देती किसी को इस शहर में,
ख़ुदा का दिया, कोई ऐसी महफ़िल नही यहाँ!
इन पगडंडियों से मैं भी कभी गुज़री थी,
वो भी एक वक़्त था जो हाथों से फिसल गया!
उम्मीद करती रही तेरे शब्दों के गूँज की,
पर, शब्द ख़ामोश रहा अपनी ही बेबसी में!
***********
Posted in Own Hindi Poems, Own Sher n Ghazal | 32 Comments »
Posted by Rewa Smriti on May 13, 2008
शब्दों की दुनिया में
शब्दों से खेल रही
सपनो के साज़ में
दिल की आवाज़ हूँ!
तुम सुनो वो लफ्ज़ हूँ
ना समझो तो राज़ हूँ
गुनगुनाती जो भी आज
तेरे धड़कन में छुपी
एक अनोखी, राग हूँ!
ना गंगा की निर्मल धार
ना आकाश में चमकती
चाँद की धूमिल चाँदनी
किंतु, एक अखंड प्रवाहिनी
मैं, तुम्हारी ही पहचान हूँ!
*******
[written on 20/03/2008]
Posted in Own Hindi Poems | 24 Comments »
Posted by Rewa Smriti on May 5, 2008
मैं बहुत सीधी हूँ,
मुझे जलेबी ना समझना
इमरती समझोगे बुरा होगा
भूलकर भी चाइनीज़ नूडल्स समझ
मेरे सीधेपन को अबला कहकर,
हद की सीमा पार ना करना!
देखो मैं बहुत सीधी तो हूँ,
इसे मेरी कमज़ोरी ना समझना
सीधा होना कोई बेवकूफी नही
सीधेपन को नादानी ना समझना
वरना मेरे सीधेपन से बना,
सब्र का बाँध टूट जाएगा!
सीधी हूँ, सबला भी हूँ,
बिन ढक्कन का डब्बा ना समझना
कुछ सीमाएँ हें मेरे सीधेपन की
बस इतना सोच लो और संभल जाओ,
मुझे उल्लू समझने की नासमझी ना करना!
फिर भी हाल-ए-दिल बयाँ करती हूँ,
वाक़ई मैं बहुत ही सीधी हूँ!
**************
Posted in Own Hindi Poems | 41 Comments »
Posted by Rewa Smriti on April 27, 2008
मायूस होती
जब, तुम
पास नही होते!
रोती अकेली
ख़ुद को संभालती
इतना सोच, कि
तुम्हारा साथ है
खुश होती,
और, ख्यालों में
थोड़ा इतराती भी हूँ!
डरती हूँ, कभी
मेरे लिए,
तुम्हारा प्यार
कम ना पर जाए,
और, पलक झपकते
मुट्ठी भर रेत की तरह
कहीं बिखर ना जाऊं!
इसलिए, नित सुबह
सूरज के,
पों फटने से पहले
मंदिर जाकर,
तेरे लिए
दुआ मांगती हूँ!
*********
(written on 17/03/2008.)
Posted in Own Hindi Poems | 28 Comments »