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Archive for the ‘Own Hindi Poems’ Category

चुपके से चली आऊँगी!

Posted by Rewa Smriti on June 3, 2009

चेहरे पर शिकन तक ना देख पाओगे,
हल्की फुहारों में जब भींगती चली आऊंगी!

तेरे बज़्म में है ज़न्नत, तुम ये समझ पाओगे,
सबसे नज़र बचाके जब भागती चली आऊंगी!

सुलझे रिश्तों के धागे को, यूँ ना उलझा पाओगे,
असलियत बयाँ करने जब हर बार चली आऊँगी!

बहते आँसू में दबी दर्द को, तुम ना पहचान पाओगे,
पिघलती बर्फ की चादर जब ओढ़ती चली आऊँगी!

चाँद की चाँदनी में बैठ, मुझे ना आज़मा पाओगे,
गुमसुम बैठा चाँद के साथ जब चुपके से चली आऊँगी!

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बेनाम रिश्ते!

Posted by Rewa Smriti on April 8, 2009

कभी – कभी उठ जाते हैं कदम वज़ूद को दफ़नाने में,
बेवक़्त जब खुद ही किस्मत का नक़ाब उतार जाती हूँ!

आज कैसे? क्या कहूँ? वक़्त भी पूछ उठा,
ऐसे लम्हों से गुजर, अक्सर मैं क्यूँ बहक जाती हूँ!

बदनाम करते हैं लोग, बेनाम को नाम देते हुए,
सरेआम महफ़िल में जाने कब मज़ाक बन जाती हूँ!
 
हर शख़्स यहाँ वफ़ा के साथ तर्क़-ए-वफ़ा  करता है,
राह चलते इन वफा परस्तों को अब आगाह कर जाती हूँ!

रिश्तों की पहचान हो जाती है नाज़ुक दिल को,
बेनाम रिश्तों में जब कभी अपना नाम ढूँढने जाती हूँ!

********************************

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रो पड़ी अखंड प्रवाहिनी!

Posted by Rewa Smriti on March 17, 2009

वक़्त का एक टुकड़ा
जाने कब गिरा
तलहटी के सन्नाटे में
और, तुम्हारे शब्द
हवा में बिखर
इधर – उधर
मुझे पुकारते रहें!
अचंभित दिशायें,
तुम्हारे शब्दों में उलझ
तुम्हें तलाशती रहीं!

ज़िंदगी की गुत्थी
सुलझाने की
गहन कोशिश में
ना जाने कब, कैसे?
हालातों के इस राह में
खुद ही फ़स गयी!

और, अब वक़्त के
आपा धापी में
मुट्ठी भर रेत लिए
भटक रही हूँ
इस गली से उस गली,
कभी इस शहर से
उस शहर तक,
कभी पागल
पूरवइया के साथ
पगडंडियों पर!

उसी चौराहे पर
पहुँचकर अब
थका उदास मन
एक बार फिर से
बेचैन हो उठा
और, रो पड़ी
अखंड प्रवाहिनी…!

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रोते हाथ बढ़ाया!

Posted by Rewa Smriti on February 10, 2009

सड़क पर खड़ा था
एक बच्चा बेसहारा
भूखा था वह शायद
जब मैने उसे पुकारा…

सहमा डरा सा
दूर से ही उसने
रोता हुआ, चुपचाप
अपना हाथ बढ़ाया…

पास जाकर देखा
उसके सीने पर लिखा था,
सारे जहाँ से अच्छा
हिन्दुस्तान हमारा!
हम बुलबुले हैं इसकी
कहाँ है गुलिसतां हमारा?

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धुंधले शब्द!

Posted by Rewa Smriti on December 13, 2008

कई मुद्दत्तों से
मेज पर रखी
सजी किताबों पर
जमी धूल से
धुंधले हुये
ख़ामोश शब्द
खोयी अपनी वज़ूद
और, छोड़ गयी
कुछ अफ़साने
कोमल हृदय को
फिर से रुलाने के लिए!

स्तब्ध मन
सुलगती रातें,
सन्नाटे को तोड़ती
जाने कहाँ से
आती धीमी आवाज़
और, वक़्त बेवक़्त
आभास कराते
ये धुंधले रास्ते
उन्ही धुंधले शब्दों में
किसी की नज़दीकियो का!

कुछ दूर चलके
सूनी अनजान
कच्ची राह पर
ये रुकते कदम
एहसास किया
तेरी इस नगरी में
इन दीवारों की भी
अपनी ज़ुबान होती है!
और, उनके शब्द
वे कभी धुंधले नही हुए!

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कायल हूँ…!

Posted by Rewa Smriti on November 23, 2008

कुछ बातें
मेरी तुम्हें
कभी - कभी
नाराज़ करती
पर गुस्साते नही,
क्यूँ भला ?
 
क्या यूँ ही,
इसी तरह से
मुस्कुराते हुए
तुम सब पर
अपनी नाराज़गी
जाहिर करते हो?

या मुझ पर
अपना हक़ समझ
बिना झुँझलाए
निस्संकोच होकर,
मन की बात
प्यारे अल्फाज़ में
व्यक़्त करते हो!

वाह! बहुत ख़ूब
कुछ भी कह लो
मैं तुम्हारी
इन्हीं अदाओं की
हमेशा कायल हूँ…!

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इस पगली को!

Posted by Rewa Smriti on November 12, 2008

तुम कहते हो
मैं नासमझ हूँ,
चलो मान गयी!

तुम फिसलोगे 
मैं संभालूंगी,
तुम गुस्साओगे 
मैं मनाऊंगी,
खिजकर डांटोगे
सहम जाऊंगी!

पर, जाने क्यूँ
तुम्हारे सामने
इस पगली को
आज, थोड़ा भी
चुप रहने को 
जी नही करता है!

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चुपके से रोता है!

Posted by Rewa Smriti on November 5, 2008

वक़्त भागता है
ये सोच अक्सर
सब भागते हैं
ख्वाबों ख़यालों को
अपने साथ लिए!

जहाँ भी देखो
होड़ मची है
मंज़िल पाने की
या, ज़िंदगी से आगे
निकलने के लिए!

किसे है ख़बर
भाग दौड़ के
इस सफ़र में
यहाँ हर कदम पर
कुछ खोता हुआ
नज़र आता है!

और, कभी कभी
रात के अंधेरे
गहरे सन्नाटे में
ये दिल भी
एक ओर सिरहाने में
सिर रखकर
चुपके से रोता है!

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ख़्वाबों के लबों पर!

Posted by Rewa Smriti on November 3, 2008

कई दिनों से
जिधर भी जाती
सभी पूछते हैं, 
एक सीधा सवाल-
‘तुम मेरे कौन हो?’

कितनी बार बताऊं
किस किस को बताऊं
और, कैसे बताऊं?

धीमी आवाज़ में
जब कभी बताती
इतनी बड़ी दुनिया
पल में चौंक जाती है!

सिर्फ़ इतना सुन कि
मेरे ख़्वाबों के लबों पर
तेरे सपनो के वज़ूद को 
रोज सजाकर रखती हूँ
अपने आँचल के छाँव में!

और, जबकि मैं
तुम्हारे रूह से लिपटी
सिमटी हुई हक़ीक़त
तेरे साथ चलने वाली,
तुम्हारी ही परछाई हूँ!

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कुछ नयी बताओ!

Posted by Rewa Smriti on October 22, 2008

तुम्हारे सामने
मैं पुरानी,
मेरी बातें भी
हो गयी पुरानी!

जब कभी तुम्हें
कुछ लगती सुनाने
तुम कहते हो -
‘यह सुना हुआ है,
कुछ नयी बताओ’!

कहाँ से लाऊँ
अब, नयी बातें
जहाँ जिक्र हो
नयी मुलाक़ातें!

और, सब कुछ
तुम्हें हमेशा, 
लगे नया नया!

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