कल रात करीब 9 बजे बगल में रहने वाली एक आंटी सेवई देने आई. मैने उनसे पूछा, “आंटी ईद आज था या कल है”. उन्होने कहा कि “कल है बेटा, आप सुबह – सुबह ऑफिस चले जाओगी इसलिए अभी दे रही हूँ!” यह सुनकर बहुत खुशी हुई कि आंटी को इतना ख़याल है. फिर उनसे कही कि ‘मेरा नवरात्रि का फासटिंग चल रहा है, मैं खा नही पाऊँगी’. बोलते हुए थोड़ा बुरा भी लग रहा था. लेकिन शायद उन्हे लगा कि आज उपवास है, इसलिए वो कहने लगीं कि “अभी फ़्रीज़ में रख दो, कल खा लेना”. तब मैं उन्हें बताई कि ‘मैं नौ दिन अभी अन्न नही खाऊंगी’ तो आंटी बोल पड़ी ‘उपवास जब भी समाप्त होगा मुझे बताना, मैं आपके लिए स्पेशल बिरयानी बनाऊँगी’. वाह! सच में दिल इतना सुन ही खुश हो गया. सोच रही हूँ, क्या वाक़ई बड़े शहरों में भी हमारे पड़ोसियों को इतना ख़याल रहता है….!?
आज ईद है और दिल से बस यही दुआ निकल रही है कि सभी को ईद मुबारक हो. ऑफिस पहुँचकर सबसे पहले ज़ुबैर भैया को फोन की और ईद मुबारकबाद दिया. उन्होने बताया कि वो कल रात को ही दिल्ली पहुँचे हें, फिर मैने सोचा कि भैया रोमिंग में हें तो बाद में बात कर लेंगे. मैं बंद करना चाह रही थी लेकिन वो करने ही नही दिए और हम दोनो ने काफ़ी देर बात की. लेकिन इस बार उनसे भी बात करके लगा कि वो बहुत खुश नही हें. ख़ैर इस बार ना तो ईद और ना ही दुर्गा पूजा की खुशी झलक रही है. वैसे भी कोई खुशी खुशी मनाए भी कैसे, कहीं बाढ़ तो कहीं ब्लास्ट लोगों का सुख चैन छीन लिया है!
सुबह 5 बजे जब मैं पूजा कर रही थी तो अचानक बिहार में आए बाढ़ के चलचित्र मेरे सामने आने लगा. एक पल के लिए मन विचलित हो उठा, और कुछ देर के लिए मौन हो गयी. फिर पूजा समाप्त कर ऑफिस के लिए चल दी. दिमाग़ में ये चल रहा था कि न्यूज़ तो सुनी नही हूँ, और इस बात का भय लग रहा था कि फिर कहीं ब्लास्ट ना हुआ हो.
जब ऑफिस पहुँची, न्यूज़ पेपर पढ़ी तो पता चला कि जोधपुर और अगरतल्ला में ब्लास्ट हुआ है! मुझे याद आ गयी दिल्ली में हुए बम विस्फोट की घटना, और मैं सहम सी गयी. उस दिन जब दिल्ली में ब्लास्ट हुआ था तो मैं अपने दोनो बहनों के साथ लाजपत नगर मार्केट में शॉपिंग कर रही थी. अचानक भाई ने फोन किया और ब्लास्ट के बारे में बताया. जब हमें पता चला तो हम वहाँ से निकल पड़े, पर हमे ऑटो नही मिल रहा था, और करीब एक घंटे के बाद ऑटो मिला. इधर घर वालों को पता चल गया कि हम मार्केट गये हें, सभी डरे -डरे से हमें फोन कर रहे थे. कितना भयावह होता होगा वो दृश्य जब लोग पल भर में अपनी जान गँवा देते हें, सोचती हूँ तो रूह काँप जाती है. अब तो हर रात दिल एक डर लिए सोता है कि ना जाने कल सुबह का आलम क्या होगा!
सत्य और अहिंसा के पुजारी गाँधी के देश में आज चारो ओर आख़िर हिंसा क्यूँ ??
हमसे ना देखा जाए बर्बादियों का समा
उजड़ी हुई बनती में यह तड़प रहे इंसान
नन्हे जिस्मों के टुकड़े लिए खड़ी है एक माँ
बारूद के धुएँ में तू ही बोल जाए कहाँ…??