कल रौशन का पोस्ट पढ़कर मुझे मेरी बचपन याद आ रही थी. उसने अपने पोस्ट में फलों का राजा आम का ज़िक्र किया है, “कच्ची उम्र के कच्चे आम” यानि टिकोरे की बात करी है. सामने पेड़ों पर लदे फलों पर नज़र पड़ते ही हम सब बच्चे बौराने लगते थे! मुझे खट्टे टिकोरे बिल्कुल भी पसन्द नही आते थे बल्कि मीठे वाले पसंद करती थी. वैसे सही ही कहा गया है जिस चीज़ से जितना दूर भागो वो चीज़ तुम्हारे पीछे उतना ही भागेगा. मैं खट्टे टिकोरे खाने से भागती थी तो खट्टों के शहर में पहुँच गयी हूँ.
मेरे घर में आम के पेड़ों का छोटा सा बगान है, यह सिर्फ़ हम सब के खाने मात्र के लिए लगाई गयी है. दो पेड़ ऐसे हें जिनके टिकोरे काफ़ी मीठे होते हें! आम के पेड़ों में झूले भी लगाया करते थे. मुझे याद है, मैं उनके टिकोरे किसी को तोड़ने नही देती थी, और कभी- कभी तो मैं टिकोरे काउंट करती थी, लेकिन कभी भी पूरी काउंट नही कर पाई. ये सोच आज भी हँसी आती है! जब कभी भी किसी ने मेरे सामने इन पेड़ों के टिकोरे तोड़ने की कोशिश करता तो मैं रोना शुरू कर देती थी.
दोनो पेड़ों की ख़ासियत यह है कि इनकी कुछ डालें मेरे घर के छत पर लटकी रहती है, और जब आम फलता है तो ये डालें और भी झुके छत पर बिछे दिखते हें, जैसे मानो आराम से छत रूपी बिस्तर पर सो रही है. मुझे जब बचपन में डाँट पड़ती थी (कभी कभी हमेशा नही) तो चुपचाप छत पर इन्ही पेड़ों के डालों के बीच गुस्से से छुप जाती थी, फिर पापा मनाने आते थे तो रोती थी और नखरे भी करती थी.
फिलहाल बात कुछ और है जिसे मैं बहुत मिस कर रही हूँ. शायद सुनकर आप सबों को भी मेरे पर रोना आ जाएगा, लेकिन प्लीज़ रोना-धोना मत शुरू कर देना वरना मेरे ब्लॉग में बाढ़ आ जाएगी. और मीडीया वाले इसे लेकर भी एक बवाल खड़ा कर देंगे, इनका कोई भरोसा नही. घर का आम तो खा ली लेकिन दुखद बात ये है कि मैं इस बार फलों की रानी लीची नही खा पाई……अरे खाना तो दूर, चखा तक नही है. Really missing lichi very much.
LITCHI, is the queen of fruits in India. You know, Mujaffarpur city is the famous for the tasty, best and bigger size of lichi. It is globally known as “मुजफ्फरपुर का शाही लीची”! It’s Blessed with suitable agro-climatic conditions, it produces both the Shahi and China varieties over 10,000 hectares.
Bihar, which harvests 3.5 lakh tones from 30,000 hectares under cultivation by about 55,000 growers, accounts for nearly 65 per cent of India’s annual litchi production. The well-drained, calcium-rich loamy soil on the banks of the 300- km Gandok river from Narkatiaganj to Khagaria has seen litchi orchards flourishing for centuries.
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यहाँ की रसभरी लीची में बीज़ इतने छोटे-छोटे होते हें कि पूछो मत, और कुछ लीची तो बिना बीज वाले भी होते हें…मुँह में डालो तो लगेगा रसगुल्ला खा रहे हें! अरे हाँ एक बात बताना तो भूल गयी, लीची तो मीठी होती ही है और यहाँ की लीची से शहद भी काफ़ी निकलते हें. मुजफ्फरपुर वाले ब्लॉगेर्स मेरा मतलब अनुपम और शुभ, लीची खाना है खा लो लेकिन भाव मत खाना…..hehehe
Just kidding!
जब मैं और विजिया बाज़ार गये तो इतने गंदे लीची दिखे कि देखकर ही भाग गयी. बिल्कुल छोटी सुखी लीची और वो भी थोड़ी सी थी, देखकर तो ऐसा लगा ना जाने ये लोग कितने दिनो से सड़ा रहे होंगे. फिर हम दोनों की नज़र जामुन पर पड़ी और हम इससे ही संतुष्ट कर लिए. जामुन से याद आया हमारे यूनिवर्सिटी (JNU) में सड़क के दोनो किनारे जामुन के पेड़ भी काफ़ी थे. कभी- कभी सड़कों पर भी जामुन गिरे दिखते थे. अब ज़रा सोचो लीची के राज्य की रहने वाली लीची नही खा पाती इससे ज़्यादा क्या बोलूं! बचपन में घर पर लीची बेचने वाले आते थे और 20-25 रुपए में सौ लीची दे जाते थे..
ख़ैर अब ना तो वो झूले हें, ना ही हम टिकोरे काउंट करते हें. अब बस यही कुछ खट्टी मीठी यादें रह गयी है!