कुछ ख़ास सड़कों की,
आज शिकायत है,
कहीं हम,
गुमराह तो नही हुए?
क्यूँ ख़ौफ़ आज,
हर राह-गुज़र के,
दिलों में,
समाने लगा है,
अपनी कामयाबी का,
क्या यही पहचान है!
माना कि,
हम आज़ाद हें,
फिर क्यूँ,
हर कोई,
अपनी किस्मत पर,
यूँ आँसू बहा रहे हें!
भूखे भटकते,
मरते बच्चों को,
ये सड़कें,
आज बख़ूबी,
होशियारी से,
राह दिखा रही है!
मना लो जश्न,
आज़ादी की,
कर लो सोलह सृंगार,
बस इन्हें लौटा दो,
हँसती-खेलती,
उड़ती खिलखिलाती,
इनकी खुशियों का संसार!