अए ज़िंदगी,
तेरे कितने सवाल?
कितना इंतेहां लेगी तू,
रिश्तों की आड़ में,
तेरे मर्ज़ी पर,
बहुत कुछ,
हँसकर, ख़ुशी से,
स्वीकार किया मैने!
तेरे इस खेल में,
ख़ुद का मज़ाक बनाई,
पलकें भिंगोई,
अरमान टूटे,
आह तक ना निकली,
ना कोई शिक़ायत,
ना शिकवा,
पर, कब तक?
अब बस भी करो,
ऐसा ना हो,
तेरे सवालों की ढेढ़,
ख़त्म होने से पहले,
ख़ुद ही ख़त्म हो जाऊं!
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