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    वैष्णव जन तो तेने कहिए जे, पीर पराई जाने रे.....!
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Archive for January, 2008

तेरे कितने सवाल…!

Posted by Rewa Smriti on January 27, 2008

अए ज़िंदगी, 
तेरे कितने सवाल?

कितना इंतेहां लेगी तू,
रिश्तों की आड़ में,
तेरे मर्ज़ी पर,
बहुत कुछ,
हँसकर, ख़ुशी से,
स्वीकार किया मैने!

तेरे इस खेल में,
ख़ुद का मज़ाक बनाई,
पलकें भिंगोई,
अरमान टूटे,
आह तक ना निकली,
ना कोई शिक़ायत,
ना शिकवा,
पर, कब तक?

अब बस भी करो, 
ऐसा ना हो,
तेरे सवालों की ढेढ़,
ख़त्म होने से पहले,
ख़ुद ही ख़त्म हो जाऊं!

**************

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शब्द मेरे तुम कहाँ खो गये…!

Posted by Rewa Smriti on January 14, 2008

शब्द,
मेरे अपने,
तुम कहाँ खो गये?

देकर,
दुनिया में दस्तक,
बिन आहें भरे,
आज,
कर दिल में दफ़न, 
भीड़ में,
हो गये खामोश,
या,
अचानक,
आसानी से,
एक अजनबी बन,
तुम ख़ुद को,
ख़ुद ही में खो गये!

शब्द मेरे,
तुम कहाँ खो गये!

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