दूर-दूर तक फैला,
आकाश को छूता,
यह समुंदर का पानी,
मैं जो देख रही हूँ,
तुम्हारे आने के,
आहट मात्र से,
मेरे पास आकर,
मेरे क़दमों को छूकर,
वापस लौट जाती है!
मन मेरा जाने ना,
क्या है इसका मक़सद,
क्यूं ये लहरें,
कुछ ही लम्हों में,
सवालों की भीड़ छोड़,
बिना शोर किये,
धीरे से,
वापस लौट जाती है!
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